सोमवार, 11 जून 2012

13, शोभा रस्तोगी ‘शोभा’ व उनकी लघुकथाएं:


पाठकों को बिना किसी भेदभाव के अच्छी लघुकथाओं व लघुकथाकारों से रूबरू कराने के क्रम में हम इस बार श्रीमती शोभा रस्तोगी ‘शोभा’ की लघुकथाएं उनके फोटो, परिचय के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है पाठकों को  श्रीमती  शोभा  की लघुकथाओं व उनके बारे में जानकर अच्छा लगेगा।-किशोर श्रीवास्तव 


परिचय :
नाम-   शोभा रस्तोगी  शोभा      
शिक्षा- एम. ए. [अंग्रेजी-हिंदी ], बी. एड. , शिक्षा विशारद, संगीत प्रभाकर [तबला]            
जन्म– 26, अक्तूबर 1968 ,  अलीगढ [उ. प्र.]
सम्प्रति- सरकारी विद्यालय दिल्ली  में अध्यापिका      
प्रकाशित रचनाएँ:  पंजाब केसरी, राष्ट्र किंकर, हम सब साथ साथ, केपिटल रिपोर्टर, कथा संसारबहुजन विकास,  न्यू ऑब्जर्वर पोस्ट, शैल सूत्र, सुमन सागर, जर्जर कश्ती  आदि   में  लघुकथा, कविता, कहानी, लेख आदि प्रकाशित | ' खिडकियों पर टंगे लोग ' लघुकथा  संग्रह  में लघुकथाएं संकलित | हम सब साथ साथ द्वारा अ. भा. लघुकथाकार सम्मान प्राप्त | आकाशवाणी भोपाल से लेख प्रसारित | 
पोर्टल पर प्रकाशित सृजनगाथा.कॉम , लघुकथा.कॉम , साहित्याशिल्पी.कॉम,  शब्दकार.कॉम, रचनाकार.कॉम पर लघुकथा, कविता, समीक्षा आदि प्रकाशित
पता- RZ-D- 208, B, डी.डी.ए. पार्क रोड, राज नगर-II, पालम कालोनी, नई दिल्ली- 110077  
Mo. 9650267277
ईमेल: shobharastogishobha@gmail.com  


लघुकथाएं:



                                                                                                गुलामी 



‘कितनी सुन्दर झालर हैं न पापा ! खिलते गुलाब के फूल, गेंदे की माला और वो देखो... सोने के सिक्के फेंकती लक्ष्मी माँ ... लो न पापा इसे।’ ठुमक रहा था नन्हा।
‘हाँ .... हाँ....’
‘हमारे देश में कितनी अच्छी लाइटें बनती है न पापा।‘ अपने देश पर गौरवान्वित था बालक।
‘अपने नहीं . ये सब चाइना का माल है .. सस्ता , सुन्दर ..पर टिकाऊ नहीं।’ पिता ने समझाया।
‘क्या चाइना ?.. हमारे देश में ?.. हम गुलाम हो जाएँगे ?’
‘बिजली के सामान में गुलामी कहाँ से आगई ?’
‘पापा.. इतिहास की मेम बता रहीं थी, पहले हमारा भारत आजाद था फिर ईस्ट इंडिया कंपनी आई सौदागर बनके। धीरे-धीरे पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया। हम हो गए न गुलाम।’ बालक सहज था। 
पापा बच्चे का मुँह देख रहे थे। दुकानदार भौंचक था। इतनी दूर की तो न सोची कभी।
‘चलो .. मुझे ऐसी दुकान पर ले चलो जहाँ भारतीय सामान मिलता हो। हम अपने देश की चीजों से ही रौशनी करेंगे अपना घर।’ पापा को ठेलते हुए बच्चा आगे बढ गया। मुडकर देखा तो सुन्दर झालरें उसका मन लुभा रहीं थीं पर अब उसे उनमें सुन्दरता नहीं अपितु गुलामी नज़र आ रही थी।   

नवरात्रे                                                                                                      



चौधरी साहब बाजार से निकल रहे थे, अचानक सुखूबाई टकराई......‘कैसे हो चौधरी !’ 
‘सुखूबाई ! मै ठीक हूँ।’
‘एक नई कन्या मतबल नया माल आया है कोठे पे....आना चौधरी।’
‘नहीं सुखूबाई! अभी तो नवरात्रे चल रहे है न ...कन्या को हाथ लगाना मना है।’
चार दिन बाद चौधरी सुखूबाई के कोठे पर थे। 
‘अरे ला ...सुखूबाई , नया माल कित सै?’
‘चौधरी ! अब क्या हाथ लगा लोगे कन्या के ?’
‘इब तो सब कुछ लगा लूँगा, नवरात्रे जो ख़त्म हो गए हैं। जा जल्दी लेकर माल ला। हाथ साफ करता हूं।


                                                                                              ब्रह्म भोज 


आज शुक्ला जी के घर ब्रह्मभोज था   मृत्यु  उपरांत किया जाने वाला भोज    दो साल से शुक्लाजी अकेले रह रहे थे    आर्थराइटिस व डाईबीटीस से पीड़ित    तीनों बेटों को फुर्सत नहीं थी आकर हाल भी पूछने की   मृत्यु की सूचना पाते ही तीनों ने आकर दाहकर्म किया    तेरह दिन रूककर इस विशाल मकान को प्रोपर्टी डीलर के हाथों बेच दिया    लाखों हाथ आये    तीन हिस्से बँट गए    उसी में से थोडा ब्रह्मभोज में लगा दिया   पंडित व बिरादरी के लोग तारीफ कर रहे थे , "वाह ! क्या ब्रह्मभोज था ! दिल खोल कर पिता की आत्मा को तृप्त किया है "
वाकई , ब्रह्मभोज बहुत बढ़िया था

फ़रियाद                                            


राशन दफ्तर में फरियाद हुई -'राशन कार्ड बनवाना है ।

'उधर जाइए'.. दिशा निर्देशित करती हुई मुड़ी ऊँगली ने दबंग व्यक्ति की ओर इशारा किया। 
'राशन ..............' पुन: प्रार्थना की । 
' यह फार्म भरकर १५०० रुपए जमा कर दो '.. हेकड़ी से भरपूर आवाज अकड़ी । 
' १५०० रुपए ....? वो किसलिए ...? - यह सरकारी सुविधा तो मुफ़्त में प्रदत्त है’- फरियादी की आवाज में जागरूकता झलकी । 
' तो सरकार से बनवा लो ....' ... दबंग ऑफिसर का रुतबा बढ़कर बोला । 
' मै एफ़. आई. आर. करवाऊँगा! 'ज्वार-भाटे की लहरें घिर गईं फरियादी के माथे पर । 
' एफ़. आई. आर. ! उसके लिए थानेदार को भेंट चढ़ाना मत भूलना !'  दबंग व्यक्ति और दबंगई से बोला । 
'मै पार्षद-विधायक तक जाऊँगा '- माथे की लकीरों ने और विस्तार लिया । 
'तो ......... जितना ऊपर जाओ, उतनी मोटी रकम लेते जाना। अधिक ऊपर मत चले जाना। वहाँ जो जाता है, लौटता नहीं है-' दबंग भेड़िया अपनी रोज़मर्रा की अनुभवी आवाज में गुर्राया । 
'मतलब..? देश में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन जाग्रत हो रहे है । अन्ना.....,' 
पूरी बात मुँह से निकल भी न हो पाई थी कि दबंग सर्प ने विषैला डंक मारा-' क्या होगा इन सबसे ? अन्ना हो या कोई और सरकार तो अपना बचाव कर ही लेती है।'
' यह लोकतंत्र है?’ वह रुआँसा हो गया । 
'जी हुज़ूर !!’ -दबंग ने पान की पीक पच्च से दीवार पर मारी और दाँत पीसे-हाँ, यही लोकतंत्र है !!'
फ़रियादी बेहोश होकर वहीं गिर पड़ा।

                                                                                                                                                     पार्षद


राधा का भाई शिवराम निगम चुनाव में खड़ा था| आस थी पार्षद बनने की| घर के सभी सगे सम्बन्धी चुनाव प्रचार में जुटे थे| आज हरिजन मोहल्ले का दौरा करना था|
हरिजन बस्ती में घुसते ही राधा की नाक-भों चढ़ने लगी| शिवराम ने देखा तो बहन को धमकाया,' अरी राधा! मुझे इनसे वोट लेने है|'
'ठीक है, भैया!' कहकर राधा सामान्य होने की कोशिश करने लगी| सभी जगतिया के घर में घुस गए| जगतिया ने चाय मंगवाई| 'क्या भैया! इसके घर की चाय? मेरा तो जी ख़राब हो रहा है|' राधा भाई के कान में फुसफुसाई|'ओह राधा! तू सारा खेल बिगाड़ देगी| मुझे पार्षद बन जाने दे| फिर तू जगतिया की चाय का कसैला स्वाद भी भूल जाएगी|' शिवराम ने धीरे से कहा|
'अच्छा भैया! अब समझ गई|कह्कर राधा चाय की चुस्कियां लेने लगी|

रोशनी                                              


'देख अम्मा, तेरी पोती आई है तेरो अपरेसन करवे|'
'है ? मेरी पोती?' बुढिया की आँखों में हैरानी थी|
'हाँ, जे बोई पोती है जाके जनम पे तेने कितना रार मचाई|'
सफल आपरेशन के दो दिन उपरांत अम्मा को घर ले जाया गया|
'कैसी हो, मेरी अम्मा|' डॉ पोती ने दादी का हाल पूछा|
'अरे लल्ली! तेने मोय बचा लियो| तेरे हाथ जोरूँ| मैने तोसे कहा- कहा न कहयो| हमारे खानदान में तेरे नाम को परकास फ़ैल रह्यो है| कोई छोरा डागदर न बनो पर तू बन गयी| मोय तोपे घमंड है|'
'अम्मा, छोरी रोशनी होती है| रोशनी को कितने भी अंधकार में रख लो- एकाध किरण तो फूट ही पड़ती है और जीवन के लिए एक ही किरण काफी होती है|'
'सच्ची कही बेटा ! छोरी रोशनी होवे है|'



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