गुरुवार, 10 मई 2012

12, रतन चंद "रत्नेश" व उनकी लघुकथाएं:


पाठकों को बिना किसी भेदभाव के अच्छी लघुकथाओं व लघुकथाकारों से रूबरू कराने के क्रम में हम इस बार श्री रतन चंद "रत्नेश" की लघुकथाएं उनके फोटो, परिचय के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है पाठकों को श्री  रत्नेश की लघुकथाओं व उनके बारे में जानकर अच्छा लगेगा।-किशोर श्रीवास्तव 


श्री रतन चंद "रत्नेश" 

परिचय :

- 20 अगस्त 1958 को प- बंग के हुगली जिले में जन्म।
- प्रारम्भिक पाठशाला शिक्षा डनलप उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, साहागंज, हुगली के पश्चात् हुगली मोहसीन कॉलेज] चिन्सुरा ¼प- बंग½ से विज्ञान में स्नातक।
- दो कहानी संग्रह सिमटती दूरियां और एक अकेली प्रकाशित। इसके अलावा हिमाचल की श्रेष्ठ लघुकथाएं का संपादन तथा बांग्ला की श्रेष्ठ कहानियां का अनुवाद प्रकाशित। देश भर की विभिन्न पत्र&पत्रिकाओं में कविता] कहानी] लघुकथा] व्यंग्य] यात्रा&संस्मरण] लेख] बाल साहित्य व मूल बांग्ला तथा पंजाबी से अनुवाद का निरन्तर प्रकाशन।
संप्रतिः केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य विभाग में बतौर वरिष्ठ तकनीशियन कार्यरत।
- हिमाचल कला&संस्कृति एवं भाषा अकादमी] शिमला द्वारा अनुवाद के लिए पुरस्कृत। हिमाचल विकास मंच] चंडीगढ़ द्वारा सम्मानित] दिशा साहित्य मंच] सुजानपुर] पंजाब द्वारा पुरस्कृत। नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, चंडीगढ़ द्वारा 2009 का साहित्यकार सम्मान। भाषा एवं संस्कृति विभाग] बिलासपुर व हिम लोक कला मंच द्वारा 2010 को साहित्य सेवा के लिए सम्मानित।
संपर्कः म- नं- 1859] सेक्टर 7&सी] चंडीगढ़] 160019] हरियाणा
मो- 9417573357
ईमेलः  ratnesh1859@gmail.com


लघुकथाएं:

अनपढ़


पनी कोठी में कुछ काम कराने के लिये बाबू रामदयाल पास ही के चौराहे से एक मजदूर को पकड़ लाए। वह एक लुंगी और पुराने सी जगह&जगह से पैबंद किये हुए कुरते में था।
बाबू रामदयाल उसे लेकर पैदल ही आ रहे थे। उन्होने पूछा] ^क्या नाम है तेरा*
  ^जी बाबू------ सुखी राम।*
बाबू रामदयाल मन ही मन मुस्कराये] उसके नाम पर शायद।
रास्ते में एक जगह मस्जिद के सामने खड़े होकर सुखी राम माथा टेकने की मुद्रा में खड़ा हो गया।
बाबू रामदयाल को आश्चर्य हुआ और वे दूरदर्शनी डायलाग बोलने लगे---
  ^क्यों बे] तू मुसलमान है क्या\*
 ^नहीं-नहीं बाबू---- हम तो हिन्दू हैं।*
  ^तो फिर मस्जिद के सामने सर नवां रहा हैA*
सुखी राम सहजभाव से कहने लगा--
  ^हम तो अनपढ़-गंवार है बाबू जी। हमार खातिर का मस्जिद और का मंदिर] सब एक ही हैं। इनका भेद तो आप जैसे पढ़े&लिखन लोगन को ही ज़्यादा पता है।*

अपराध बोध


शाम का अंधियारा घिर आया था। मैं साइकिल पर अपने घर लौट रहा था। सड़क भरी पड़ी थी। लोग दफ्तरों से घर की ओर भागे जा रहे थे।

रास्ते में बहुत से ठेके हैं। इस समय यहां भी भीड़ उमड़ने लगती है। पुलिया से कुछ आगे निकला तो मैंने एक आदमी को सडक के किनारे लुढ़का पाया। शायद वह भी नशे में धुत्त था। पास ही उसकी साइकिल भी उसकी ही तरह लुढ़की पड़ी थी।

राहगीर उस पर निगाह डालते और आगे बढ़ जाते। मैंने भी गौर से देखा। बुढ़ापे की ओर बढ़ता शरीर था। मैं भी आगे बढ़ गया।

^शराब पीकर लोग ऐसे ही पड़े रहते हैं।* मैंने मन ही मन उपेक्षा से कहा] पर ज्यों&ज्यों घर के समीप पहुंचता गया] मेरे मन में एक बोझ समाता चला गया। उस आदमी का शरीर मेरी आंखें के सामने घूमने लगा-

^कहीं बेचारा बीमार न हो। कोई भी उसे अस्पताल नहीं पहुंचाएगा और रात भर में ही वह काठ का हो जाएगा। मुझे उसकी मदद करनी चाहिए थी।*

घर पहुंचे दस मिनट गुजर गए। मन में अपराध बोध गहराने लगा। मन उचट गया और तब निश्चय किया कि वहां जाकर आऊं और उस व्यक्ति को किसी अस्पताल मंs पहुंचाने का बंदोबस्त करूं।

साइकिल लेकर घर से निकला ही था कि पड़ोस में रहने वाले वीरेन्द्र जी मिल गए। कहने लगे, ^रवि भाई] पुलिया के पास देखा] साला वह शराबी कैसे लुढ़का पड़ा थाA*

उनका ऐसा कहना कतई मुझे अच्छा नहीं लगा। प्रत्युत्तर में मैंने कहा] ^भई हो सकता है कोई बीमार हो और उसे सहायता की आवश्यकता हो।*

^ज़नाब] मेरे दफ्तर में ही क्लर्क है। एक नंबर का शराबी] मैं उसे अच्छी तरह जानता हूं। घर को भी नरक बनाए हुए है।* उन्होंने कहा।

मैंने साइकिल दुबारा रख दी और इत्मीनान से अपने कमरे में लौट आया। अपराध&बोध काफुर हो चुका था।

लुटेरे


म दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों को होटल में ही रहने दिया और समुद्र के किनारे आ गए। दूर-दूर तक फैला समुद्र का अनंत विस्तार। शहर की भागदौड़ भरी व्यस्त दुनियॉ से जुदा यह सुकून की दुनिया थी और पिछले एक सप्ताह से हम यहां के एक होटल में ठहरे थे। आखिर कल उसी भीड़ में फिर से लौट जाना था।

सागर किनारे दूर तक फैली रेत पर अपने अंतिम निशान छोड़ जाने के लिए हम बहुत दूर तक चले आए। विशाल ने जूट के थैले में रखी बीयर की दोनों बोतलें निकाल लीं और हम एकांत में आती हुई लहरों के सम्मुख जा बैठे। अपनी चाबी के छल्ले में लगे ओपनर से विशाल ने बीयर का ढक्कन खोला और मेरी ओर बढ़ा दिया। अपनी-अपनी बोतलें थामे हम आती हुई लहरों को गिनने का विफल प्रयत्न करने लगे। बीयर धीरे&धीरे खत्म हो रही थी। इस बीच हमने गौर किया कि कुछ युवक और अधेड़ हम पर निगाहें रखे हुए हैं! न जाने कहां से आकर उन्होंने मानो हमें अपने घेरे में ले लिया था। दिखने में गरीब] कृशकाय- हम पर भारी। वे पांच थे और हम दो। उनकी निगाहें हम पर टिकी हुई थीं। बस] किसी मौके की तलाश में थे।

मैंने विशाल के चेहरे की ओर देखा। वहां हवाइयां उड़ रही थीं। मैं भी मन ही मन बहुत डर गया। गले में पड़ी सोने की चैन कॉलर में छिपाने की कोशिश की। विशाल ने धीरे से कहा] ^जितना पी सकते हो] पी लो। बोतल फेंको और यहां से खिसको।*

मैं सुरूर में था। अपनी दायीं पेंट की जेब पर इस तरह हाथ मारा जैसे वहां पिस्तौल हो। पिस्तौल था नहीं। मोबाइल पर हाथ पड़ा। उसे निकालकर लहराते हुए उन्हें डपटा] ^क्या है\ भागो यहां से।* वे सकपकाए और हमसे कुछ दूर हट गए पर उनकी निगाह अब भी हम पर थी। मैंने बीयर का अंतिम घूंट भरते हुए कहा] ^विशाल] बोतल फेंको और भागो।*

हमने बीयर की खाली बोतलों को वहीं रेत पर फेंका और अपने होटल की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने लगे। अभी वहां से हटे ही थे कि देखा वे चारों छीना&झपटी करते हुए खाली बोतलों पर टूट पड़े हैं।


4 टिप्‍पणियां:

  1. तीनों लघुकथा आम जीवन के बहुत करीब. सच है मंदिर मस्जिद का भेद तो पढ़े लिखे लोगों का किया हुआ है, आम लोगों को इन सबसे कोई सरोकार नहीं. हमारी सोच को दर्शाती बहुत अच्छी लघु कथा, रतन चंद जी को बधाई. धन्यवाद किशोर जी.

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    1. टिप्पणी के लिए धन्यवाद डॉ. जेन्नी जी|

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  2. Achchi laghu kathaye hai.kishor ji ke chitr bhi .Badhai .

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